Introduction
क्या भारत का सहकारी क्षेत्र एक और बड़े बदलाव की दहलीज़ पर है?
हाल ही में, केंद्र सरकार ने नेशनल कोऑपरेटिव डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (NCDC) को पूरे ₹2,000 करोड़ की सहायता देने का फैसला किया है। सुनने में आकर्षक लगता है, लेकिन यह पैसा असल में करेगा क्या? देशभर के 13,000 से ज्यादा सहकारी संस्थानों और लगभग तीन करोड़ सदस्यों को आखिर इससे क्या फायदा होगा?
इस फैसले ने सहकारी क्षेत्र, खासकर ग्रामीण भारत की आर्थिक स्थिति पर एक नई बहस छेड़ दी है – क्या सच में यह कदम विभाग को एक नई ऊंचाई तक ले जाएगा या कुछ पुराने घाव फिर से हरे होंगे?
Background / Context
क्यों है ये मुद्दा अहम?
अब सोचिए, भारत के ग्रामीण हिस्सों में, जहां आज भी ज्यादातर लोग कृषि, डेयरी, मत्स्य पालन, शक्कर, वस्त्र और अन्य प्राथमिक उत्पादन के व्यवसाय से जुड़े हैं — उन सभी को एक मजबूत सहकारी ढांचा बिना ब्याज और भारी कर्ज के जरिया देता है।
लेकिन, पिछले कुछ सालों में तमाम सहकारी संस्थाएं वित्तीय तंगी का सामना कर रही हैं।
संक्षिप्त तथ्य:
- कब: 20 जून 2024 (गुरुवार), केंद्रीय मंत्रिमंडल फ़ैसला
- किसने: नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
- क्या: ‘ग्रांट इन एड टू एनसीडीसी’ स्कीम को मंजूरी
- कितना: ₹2,000 करोड़ कुल (हर साल ₹500 करोड़, चार साल में)
- क्यों: सहकारी क्षेत्र को मजबूत करने के लिए, खासतौर से ग्रामीण भारत में
NCDC अब इस फंडिंग के बदले अगले 4 साल में सीधे बाज़ार से ₹20,000 करोड़ तक उठा सकेगा।
इतनी बड़ी रकम उम्मीद जगाती है, लेकिन सवाल भी खड़े करती है: यह पैसा सही हाथों तक पहुंचेगा या समस्या जस की तस बनी रहेगी?
Main Developments & Insights
फैसले की मुख्य बातें – किसने क्या कहा
सरकारी बयान:
“इस स्कीम के तहत लगभग 2.9 करोड़ सदस्य, 13,288 सहकारी समितियां लाभान्वित होंगी – जिनमें डेयरी, मछलीपालन, शक्कर, वस्त्र, भंडारण, महिला सहकारी आदि शामिल हैं।”
ये पैसा कॉपरेटिव्स में खर्च कैसे होगा?
- नई परियोजनाओं की शुरुआत
- मौजूदा गतिविधियों का विस्तार
- टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन (यानी सहकारी समितियां अब और आधुनिक हो सकेंगी)
- वर्किंग कैपिटल (काम के लिए तात्कालिक धन)
- इन्फ्रास्ट्रक्चर डिवेलपमेंट और शॉर्ट-टर्म वर्किंग लोन:
“NCDC अब खुद फंड जारी करेगा या राज्य सरकारों के जरिए – जिसके लिए ज़रूरी सुरक्षा या गारंटी मांगी जाएगी।”
जोखिम और चुनौतियाँ: कितना है खतरा?
- अतीत के घाव: माना जाता है कि देश के कई सहकारी पिछली सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता की कमी, भ्रष्टाचार या ब्याज के बोझ से जूझते रहे हैं।
- पैसे की निगरानी: स्कीम के तहत NCDC को फंड डिस्बर्समेंट, प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग और रिकवरी की जिम्मेदारी दी गई है।
क्या बड़ी रकम का सही तरह से इस्तेमाल होगा?
किसे होगा सबसे बड़ा फायदा?
- महिलाएं और हाशिए के समूह:
योजनाबद्ध फंडिंग खासतौर से महिला-संचालित सहकारी, और छोटे किसानों के लिए है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा क्रेडिट सिस्टम में दरकिनार कर दिया जाता है। - रोज़गार सृजन: इन्फ्रास्ट्रक्चर/बिजनेस-विस्तार के साथ नए-नए काम के मौके आएंगे, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में।
महत्वपूर्ण आंकड़े
- 8.25 लाख से ज़्यादा: देशभर में पंजीकृत सहकारी संस्थाएं
- 29 करोड़: कुल सदस्यों की संख्या
- 94% किसान: किसी-न-किसी सहकारी संस्था से जुड़े
Global/US/India Perspective
भारत और दुनिया में सहकारी आंदोलन की अहमियत
वैसे तो सहकारिता का जन्म यूरोप में हुआ, लेकिन भारत में यह आंदोलन गांव-गांव में फैला है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) जैसे बड़े संगठन भी मानते हैं कि सहकारी संस्थाएं समाज के सबसे निचले तबके तक आर्थिक आज़ादी और आत्मनिर्भरता पहुंचाती हैं।
ग्लोबल लेवल पर, जैसे ब्राजील या अमेरिका में क्रेडिट यूनियनों और एग्रीकोप्स ने कृषि और ग्रामीण विकास की दशा बदल दी।
वैश्विक संदर्भ में भारत की स्थिति
- बड़ी संख्या, छोटा प्रभाव:
इतने संस्थाओं और सदस्यों के बावजूद, भारत के सहकारी क्षेत्र की औसत आर्थिक हिस्सेदारी अंतरराष्ट्रीय स्तर से कम है। - खास उदाहरण:
गुजरात का अमूल (दोड्रियों की सहकारी) – जिसने केवल भारत ही नहीं, दुनियाभर में डेयरी सेक्टर को प्रभावित किया। - इस फैसले पर क्या कह रहे एक्सपर्ट्स?
एक विशेषज्ञ के शब्दों में:“अगर ट्रांसपेरेंसी और मॉनिटरिंग को सही से लागू किया जाए तो ये इनफ्यूजन एक गेम-चेंजर हो सकता है।”
What’s Next?
आगे क्या हो सकता है?
अब जब ये फंडिंग जारी होगी, कुछ प्रमुख बातें देखने लायक रहेंगी:
- कितना पैसा सही जगह तक पहुंचेगा?
अकसर देखा गया है कि लोन मिलता तो है, लेकिन ब्याज या गलत इस्तेमाल के चलते बहुत से प्रोजेक्ट ठप्प हो जाते हैं। - फॉलो-अप और ट्रैकिंग:
सरकार ने NCDC को सख्त मॉनिटरिंग और फंड रिकवरी का टास्क सौंपा है – क्या सच में सिस्टम ट्रांसपेरेंट रहेगा? - महिलाओं और छोटे किसानों को असल में लाभ मिलेगा या फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी?
विशेषज्ञ क्या मानते हैं?
कुछ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर स्कीम लागू होने के बाद फंड सही समय और उद्देश्य के लिए खर्च हुआ, तो यह देश के लिए ‘इकॉनॉमिक गेम-चेंजर’ साबित हो सकता है।
लेकिन अगर पुराने तंत्र के चलते फंडिंग में देरी और भ्रष्टाचार का सिलसिला चलता रहा, तो यह राशि भी बाकी योजनाओं की तरह फाइलों में सिमट जाएगी।
Conclusion
इस निर्णय में दम तो है – ₹2,000 करोड़ की सीधी फंडिंग एक बड़ा, पॉजिटिव संदेश देती है। लेकिन असली परीक्षा होगी क्रियान्वयन और मॉनिटरिंग की।
बार-बार हमने देखा है कि पैसा काफी नहीं, बल्कि उसकी सही समय पर सही जगह उपयोगिता ज्यादा मायने रखती है। अब देखना यह है कि भारत का सहकारी क्षेत्र इस आर्थिक डोज़ से खुद को कितना मजबूत और बदल पाता है।
और आप क्या सोचते हैं – क्या यह कदम भारत के ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए ‘गेम-चेंजर’ साबित हो पाएगा, या फिर…?
अपने विचार शेयर कीजिए नीचे दी गई कमेंट सेक्शन में!
- Consumer Case Disposal Rate Crosses 100% in 10 States & NCDRC: Shocking Trend in July 2025
- भारत का एआई खर्च 2028 तक 10.4 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की चेतावनी
- भारत ग्लोबल सेमीकंडक्टर हब बनने की रेस में आगे, क्या इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर की रफ्तार पकड़ना एक नया जोखिम है?
- India’s Forex Reserves Rise by $2.7 Billion: Hidden Risks Amid New Highs
- Hidden Dangers: SpaceX Launches Joint Astronaut Crew to ISS in NASA’s Crew-11 Mission
Outbound References
- Cabinet’s ₹2,000 Crore Grant: Will Cooperatives Survive?
- Is the Cooperative Sector at Risk After Cabinet Grant?
- Shocking Cabinet Grant: Can Cooperatives Avoid Collapse?
- ₹2,000 Crore Boost—Mistake or Masterstroke for Cooperatives?
- Hidden Threats Behind Cabinet’s Cooperative Grant
- How the ₹2,000 Crore Grant Could Fail Cooperatives
- Is India
